दास्तां 🖤

तुम इंक थे और मै निब,
बिना इंक से निभ चलती नहीं,
नहीं लिख सकते कोई दास्ता ,
जब इंक हो जाता है ज्यादा,
अक्षर जाते है सिमट ,
पड़ जाती हैं उलझनें समझने में।
लोग फ़ेक देते हैं उसे,
जिसमें सिमटे थे कुछ सवाल,
कोई समझता नहीं ,
सब व्यस्त हैं आज -कल की रेस में,
इसी तरह नहीं समझता कोई किसी की जिन्दगी को ।
उस पन्नों की तरह देता हैं अपनी जिन्दगी से निकाल,
जब नहीं रहेगी इंक ,
कैसे लिखूंगी मै तेरी कहानी,
अब बढ़ती नहीं कहानी 
रुक सी गई है,
मेरी जिंदगानी ,एक तेरी कहानी।
तुम डूब गए दूसरे इंक में ,
चल दिए अपनी राहों पर,
हम तेरे इंतजार में लिख रहे हैं कविता और कहानी।




By-mala


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